रिपोर्ट- ज्योति मौर्या जौनपुर
जानकारी के अनुसार मयारी गांव की अनुसूचित जाति बस्ती निवासी राम अचल की बेटी गोल्डी (14) बुधवार को होली के दिन किसी बात से नाराज होकर घर से निकल गई थी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उसे गांव से लगभग 200 मीटर दूर स्थित नहर की पुलिया पर बैठे हुए देखा गया था। इसके बाद उसके नहर में कूदने की आशंका जताई जा रही थी।
परिजनों की सूचना पर पुलिस ने गुमशुदगी का मामला दर्ज कर लिया था और नहर में गोताखोरों तथा जाल की मदद से तलाश अभियान चलाया गया, लेकिन उस समय किशोरी का कोई पता नहीं चल सका।
लगभग 66 घंटे की तलाश के बाद शनिवार सुबह ग्रामीणों ने सुइथाकलां के पास शारदा नहर की झाड़ियों में एक शव फंसा देखा और इसकी सूचना पुलिस को दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने शव को बाहर निकलवाया। पहचान होने पर पता चला कि वह शव गोल्डी का ही है।
सरपतहा थानाध्यक्ष यजुवेंद्र सिंह ने बताया कि शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। प्रारंभिक जांच में मामला नहर में डूबने का प्रतीत हो रहा है, हालांकि मौत के वास्तविक कारणों का पता पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही चल सकेगा।
● आजकल बच्चों और किशोरों द्वारा आत्महत्या या खुद को नुकसान पहुँचाने की घटनाएँ समाज के लिए बहुत बड़ी चिंता का विषय बनती जा रही हैं। इस विषय पर लिखते समय संवेदनशीलता, जागरूकता और समाधान—तीनों बातों को रखना जरूरी होता है। आज आप सभी पाठकों के सामने रखता हूँ।
आज समाज के सामने एक बेहद गंभीर और चिंताजनक स्थिति खड़ी होती जा रही है। आए दिन खबरें सामने आ रही हैं कि कहीं कोई बच्चा फांसी लगाकर, कहीं जहर खाकर, तो कहीं नदी, नाले या तालाब में कूदकर अपनी जान दे रहा है। यह केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज और देश के भविष्य की चिंता का विषय है।
बच्चे हमारे देश का भविष्य होते हैं। छोटी-छोटी बातों, डांट-फटकार, पढ़ाई के दबाव, पारिवारिक तनाव या भावनात्मक अकेलेपन के कारण यदि बच्चे ऐसे कदम उठाने लगे हैं, तो यह संकेत है कि कहीं न कहीं हम समाज के रूप में अपने बच्चों को समझने और संभालने में पीछे रह रहे हैं।
आज जरूरत है कि माता-पिता, शिक्षक और समाज मिलकर बच्चों के मन को समझें। उन्हें डांटने या दबाव देने के बजाय उनके साथ संवाद करें, उनकी समस्याओं को सुनें और उन्हें यह विश्वास दिलाएं कि हर समस्या का समाधान होता है, जीवन खत्म करना समाधान नहीं है।
मोबाइल, सोशल मीडिया, प्रतिस्पर्धा और मानसिक दबाव के इस दौर में बच्चों को प्यार, मार्गदर्शन और मानसिक सहारा देना बहुत जरूरी है। अगर समय रहते हम अपने बच्चों की भावनाओं को समझ लें, तो कई मासूम जिंदगियों को बचाया जा सकता है।
समाज को यह समझना होगा कि बच्चों को अंक या सफलता से नहीं, बल्कि समझ और सहारे से मजबूत बनाया जा सकता है। हर माता-पिता और शिक्षक का कर्तव्य है कि बच्चों को यह सिखाएं कि जीवन में मुश्किलें आती हैं, लेकिन उनका सामना करना ही असली हिम्मत है।
बच्चों की हर मुस्कान देश का भविष्य है, इसलिए उन्हें निराशा नहीं, उम्मीद और हौसले का रास्ता दिखाना हम सबकी जिम्मेदारी है।
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